रेल का नाम आते ही हमारे जहन में यात्रा का ख्याल सबसे पहले आता है , स्टेशन पर आती हुई तेजी से इसकी आवाज अचानक हमारा ध्यान खींच लेती है ! सभी लोग तेजी से आती हुई और जाती ट्रेन की खिड़कियों में झांकने की कोशिश करने लगते है, ट्रेन के अन्दर की जिन्दगी भी बड़ी अजीब होती है ! अक्सर यात्रा के दौरान नए नए और अलग किस्म के और मूड के लोग मिलते है मेरा तो मानना है की इस देश की ट्रेन में आप बैठकर बहुत बड़े कहानीकार बन सकते है क्योंकि हर तरह लोगो की अलग अलग कहानी होती है और अलग विचार होते है !
कोई तो इतने गंभीर होते है की अपने चेहरे पर अजीब सी भावभंगीमाये बनाते है कि सामने वाला बात करने की इच्छा रखता होगा तो चाह कर भी ना कर पाए तो कोई इतने ज्यादा गंभीर बनने की कोशिश करते है कि अपने मन को मार कर बात नही कर पाते , पर बात करना चाहते है ! कुछ ऐसे होते जो अचानक बात शुरू कर देते है इनकी बातों की शुरुआत कुछ न कुछ समस्या से होंगी और फिर वो जो शुरू होते है तो रुकने का नाम नही लेते और तो कोई उन्हें अपने जैसा आदमी मिल गया जो उनकी हाँ में हाँ मिला रहा हो, फिर देखिये उनकी बातो में मायावती की कुर्सी और दिल्ली की सरकार गिरते गिरते बच जाती है ! इसी में कुछ उस टाइप के लोग होते है जो बहुत बहुत जोर जोर से बोलते है और बातें करके अपने सारे राज अगल बगल वाले लोगो को बता देते है और वहां बैठे लोग उनका नाम उनके बच्चो की क्लास , सेलरी और ऑफिस सब कुछ जान जाते है ! कई बार भूख न लगने पर किसी और खाना खाते देख बड़ी भूख लगने लगती है आप लोगों का तो पता नही पर मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है फिर चाहे वो खाना मुझे घर में पसंद हो या न हो ! अच्छा हाँ इसमें दिल भी बड़े मिलते है सच्ची , कोई लड़का लड़की सामने बैठे होतो आँखों ही आँखों में सब कुछ हो जाता है !
अगर आपके पास रिज़र्व सीट है तो आपके मजे है कभी कभी मजे भी चकना चूर हो जाते है जब आपकी सीट पर कोई बैठा होता है तो आप बड़े गर्व से कहते है सीट हमारी है और जब वो चला जाता है बड़े गर्व से फूल जाते है जैसे रेलवे आप ने खरीद ली हो ! कुछ तो इस टाइप के केरेक्टर आते है जो केवल सोने ही उनका लक्ष्य है अपने साथ हवा से फूलने वाला तकिया लेकर आते है और सबसे पहले ऊपर की सीट देखते है जिसमे सोने को मिल जाए ! अच्छा कभी आपका ट्रेन के टॉयलेट में जाना हो, तो आपका तरह तरह का साहित्य पढने को मिलेंगा उसका उद्गम कहाँ से हुआ, कब हुआ पता नही पर वो इतिहास बन जाता है कहने का मतलब है रेलवे टॉयलेट साहित्य के मामले में बहुत रिच है ! कभी किसी नवजात शिशु का रोना और किसी बूढ़े की खांसी की खुल खुल सब कुछ होता है यहाँ ! रेलगाड़ी का किसी अनजान स्टेशन पर रुकना कोतुहल करता है यहाँ कौन रहता है यहाँ की भाषा कैसी होंगी ! रात के अंधेरे में दूर से दिखाई देती बल्ब की रौशनी या फिर कोई घर, जहाँ सन्नाटा पसरा हुआ हो !
दोस्तों एक वर्ग और भी है जो रेल सफर करता है भिखारियों का ! जी हाँ कई बार अचानक आपके पैरो के नीचे कोई बच्चा अपनी शर्ट से रेल के फर्श को साफ करता हुआ देखा होगा ! कई लोग उस पर तरस खाकर उसे पैसे देते है ! अभी किसी ने उससे पूछा की तू किधर रहता है तेरे माँ बाप के साथ क्या हुआ मुझे तो लगता है शायद उसे ख़ुद नही पता होता होंगा की वो कौन से गाड़ी में बैठा है उसे तो उसके आकायो ने बता दिया है इसमे बैठ जा और शाम को इस गाड़ी में आजा ! अगर ऐसा है तो फिर ये किसी भी ट्रेन में बैठकर भाग क्यों नही जाते, शायद इसीलिए क्योंकि शायद उस समय इनपर कोई नजर रखे रहता है
सवाल ये है की एक और जिन्दगी है जो रेल में सफर करती है पर हम इस पर ज्यादा ध्यान नही देते हजारों लाखो लोग ट्रेने में बैठे हुए है अपनी ख़ुद की कहानी गड़ते है!
: दिल्ली के मित्र विकास द्वारा कहे जाने पर ये लेख लिखा गया है !
Thursday, January 29, 2009
Monday, January 26, 2009
ऐ मेरे गणतंत्र तुम अब बूढे हो गए हो !
मेरे भारत के गणतंत्र अब आप अपने उम्र के साठवे वर्ष में कदम रख चुके है और अब और भी बूढा हो चले हो ! ऐसा गणतंत्र जो अबतक ना जाने कितने बसंत देख चुका है बहुत कुछ भुगत चुके हो ! ना जाने कितने आए और कितने गए और ना जाने कितने आपके सामने बड़े हुए और ना जाने कितनो ने आपको आंखे दिखाई ! आजकल मेरे गणतंत्र आपको कम दिखाई देता है अरे भाई हाँ थोड़ा झुककर भी चलते हो , कुछ लोग है जो इसी मजबूरी का फायदा उठाकर आपका हाथ पकड़ कर चाहे जहाँ ले जाते है जिधर चाहे बैठा देते है और आप भी चुपचाप बैठ जाते हो ! अब आपकी सुनने वाला कोई नही जिसका मन किया आपको गालियाँ दी पर कहीं फायदे की बात आनेपर आपको पुचकारा भी !
सच पूंछा जाये दोस्तों तो आजकल दादाजी (गणतंत्र ) की घर में चलती नही है ! और ना ही किसी को इनका डर रह गया है कुछ बच्चे इतने बिगड़ गए की आपके हाथ से निकल गए फिर चाहे वोह रामलिंगा हो या औरैया का विधायक या फिर तेलगी , कहीं मेरठ के पार्को में बैठे लड़के लड़किया हो या फिर पब में लड़कियों की पिटाई या फिर वो हो रक्षा सौदों में दलाली का मामला या फिर सैनिको के ताबूतों का मामला , तुम चुपचाप क्यों रह गए बताओ ? , तुमने तो आँगन में खटिया लगा ली और बैठ गए धूप सेकने , जरा घर में घुस कर देखा की की परिवार में चल क्या रहा है ! तुम्हे सच बताऊँ अब तुम्हारा नाम रह गया है तुम्हारा स्ट्रक्चर अब बस किताबों में रह गया है !
तुम्हे पता है इस देश में घोटालों करने वाले एक भी नेता को सजा नही होती बस ज्यादा से ज्यादा इस्तीफा या फिर पार्टी निष्कासन होता है तुम्हे पता है इस देश में लड़का लड़की एक पार्क में नही बैठ सकते है ! और भी बहुत चीजे है दादा जी अब तुम्हे क्या क्या बताऊ मैं नही चाहता आप हार्ट अटैक से मर जाए ! बस यहीं कहना है की इस देश में प्रधानमंत्री बनना इज्जत का सवाल हो जाता है , यहाँ अब सरकार बचाने के लिए फिक्सिंग की जाती है और बाद में स्टिंग ऑपरेशन करके कीचड़ उछाली जाती है ! अब देश में बच्चे की भूख की चिंता से ज्यादा चंद्रयान की चिंता की जाती है ! अब रहने दो क्या फायदा जो मैं बोलूँ , तुम तो शर्माने लगे हो बस यहीं कहूँगा कि आजकल मुझे दूसरे राज्य में जाने से डर लगता है पता नही कौन मुझपर हमला बोल दे ! तुम्हे ये भी बताऊँ अब मैं किसी भीड़-भाड़ वाले इलाके में नही जाता ना जाने कहाँ बम फट जाये होटल में भी खाने नही जाता हूँ इसीलिए आजकल अपने घर पर खाता हूँ ! पर अब तो घर में भी खाने के लिए कुछ नही बचा, मेरा सारा पैसा मंदी और शेयर बाज़ार डकार गए बाकी अनाज है उसे भी सरकार निर्यात दूसरे देशों को कर देती है जिससे देश में पैसा आए !
पर दद्दा सच्ची अब तो घर भी नही हैं , ये जो कोसी नदी थी न , इसका सरकार ने चेतावनी के बावजूद कुछ किया ही नही ! हम जैसे 32 लाख लोग इसकी शिकार हुए ! इस साल मैंने पूरी सर्दी टेंट में निकाली है एक लोकल नेता आया था मुझे एक शर्ट में देखा तो शाल में दे गया बस आजकल उसी का सहारा हैं ! दादा मुझे तुम्हारी याद आती है तुमने पैदा होते समय तो नेहरू ,पटेल और अम्बेडकर से बड़ी बातें की थी कि अब मैं ये करूंगा , वो करूंगा ! पर तुम भी झूठे निकले, क्या इस देश में मेरा कोई नही ! तुम्हे पता है एक बड़े कवि ने कहा था कि सबसे खतरनाक होता है सपनो का मर जाना , और अब मेरे सपने दम तोड़ने लगे है ! अब तो बस मैं यहीं चाहता हूँ कि जिस दिन तुम पूरी तरह मर जाओंगे उसके बाद फिर कभी इस धरती पर जनम मत लेना क्योंकि फिर किसी नए गणतंत्र का यहीं हाल होगा !
सच पूंछा जाये दोस्तों तो आजकल दादाजी (गणतंत्र ) की घर में चलती नही है ! और ना ही किसी को इनका डर रह गया है कुछ बच्चे इतने बिगड़ गए की आपके हाथ से निकल गए फिर चाहे वोह रामलिंगा हो या औरैया का विधायक या फिर तेलगी , कहीं मेरठ के पार्को में बैठे लड़के लड़किया हो या फिर पब में लड़कियों की पिटाई या फिर वो हो रक्षा सौदों में दलाली का मामला या फिर सैनिको के ताबूतों का मामला , तुम चुपचाप क्यों रह गए बताओ ? , तुमने तो आँगन में खटिया लगा ली और बैठ गए धूप सेकने , जरा घर में घुस कर देखा की की परिवार में चल क्या रहा है ! तुम्हे सच बताऊँ अब तुम्हारा नाम रह गया है तुम्हारा स्ट्रक्चर अब बस किताबों में रह गया है !
तुम्हे पता है इस देश में घोटालों करने वाले एक भी नेता को सजा नही होती बस ज्यादा से ज्यादा इस्तीफा या फिर पार्टी निष्कासन होता है तुम्हे पता है इस देश में लड़का लड़की एक पार्क में नही बैठ सकते है ! और भी बहुत चीजे है दादा जी अब तुम्हे क्या क्या बताऊ मैं नही चाहता आप हार्ट अटैक से मर जाए ! बस यहीं कहना है की इस देश में प्रधानमंत्री बनना इज्जत का सवाल हो जाता है , यहाँ अब सरकार बचाने के लिए फिक्सिंग की जाती है और बाद में स्टिंग ऑपरेशन करके कीचड़ उछाली जाती है ! अब देश में बच्चे की भूख की चिंता से ज्यादा चंद्रयान की चिंता की जाती है ! अब रहने दो क्या फायदा जो मैं बोलूँ , तुम तो शर्माने लगे हो बस यहीं कहूँगा कि आजकल मुझे दूसरे राज्य में जाने से डर लगता है पता नही कौन मुझपर हमला बोल दे ! तुम्हे ये भी बताऊँ अब मैं किसी भीड़-भाड़ वाले इलाके में नही जाता ना जाने कहाँ बम फट जाये होटल में भी खाने नही जाता हूँ इसीलिए आजकल अपने घर पर खाता हूँ ! पर अब तो घर में भी खाने के लिए कुछ नही बचा, मेरा सारा पैसा मंदी और शेयर बाज़ार डकार गए बाकी अनाज है उसे भी सरकार निर्यात दूसरे देशों को कर देती है जिससे देश में पैसा आए !
पर दद्दा सच्ची अब तो घर भी नही हैं , ये जो कोसी नदी थी न , इसका सरकार ने चेतावनी के बावजूद कुछ किया ही नही ! हम जैसे 32 लाख लोग इसकी शिकार हुए ! इस साल मैंने पूरी सर्दी टेंट में निकाली है एक लोकल नेता आया था मुझे एक शर्ट में देखा तो शाल में दे गया बस आजकल उसी का सहारा हैं ! दादा मुझे तुम्हारी याद आती है तुमने पैदा होते समय तो नेहरू ,पटेल और अम्बेडकर से बड़ी बातें की थी कि अब मैं ये करूंगा , वो करूंगा ! पर तुम भी झूठे निकले, क्या इस देश में मेरा कोई नही ! तुम्हे पता है एक बड़े कवि ने कहा था कि सबसे खतरनाक होता है सपनो का मर जाना , और अब मेरे सपने दम तोड़ने लगे है ! अब तो बस मैं यहीं चाहता हूँ कि जिस दिन तुम पूरी तरह मर जाओंगे उसके बाद फिर कभी इस धरती पर जनम मत लेना क्योंकि फिर किसी नए गणतंत्र का यहीं हाल होगा !
Tuesday, January 20, 2009
क्या आज इस दुनिया में कुछ अलग हुआ है !
जी हाँ लीजिये जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था वो हो चुका है जिसको जो पाना था उसे वो मिल गया है क्या आज कोई कह सकता है की 35 या 40 साल पहले जो अमेरिका में गुलाम हुआ करते थे ॥ .... आज दुनिया उसके इशारे पर चलेंगी ! क्या आज किसी को शक है कि इस दुनिया में कुछ असंभव नाम की चीज है अगर है भी तो आज वो इस पल को देख रहा होगा जब ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बन चुके है सच कहता हूँ अगर आज महात्मा गाँधी जी होते तो उनकी आँखों में से भी अश्रु धारा बह निकलती क्योंकि दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी को ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे से सिर्फ़ इसीलिए निकाल कर फेक दिया था क्योंकि वो एक काले थे ! दोस्तों सच्ची कह रहा हूँ ये घटना अचानक याद आने से मेरे अन्दर अचानक बिजली दौड़ गई है कि उस समय मोहन दास की क्या मानसिक स्थिति क्या रही होंगी , क्या वो इस घटना से अन्दर तक हिल गए होंगे या शायद उन्हें काफी देर तक ये समझने में लग गया आखिर उनका कुसूर क्या था ? या फिर वो चाहते तो अपना गुस्सा दिखा सकते थे पर शायद नही...उन्होंने उस गुस्से को ऐसे जाया नही जाने दिया उन्होंने उसे मुरब्बा बना लिया और कसम खायी कि आज तो तुमने मुझे इस ट्रेन से निकाला है पर याद रखना अगले 40 और 50 साल तुम पर भारी पड़ेंगे और मैं ख़ुद तुम्हे अपने देश से बाहर निकालूँगा !
क्या ओबामा कि जीत वाकई में गाँधी , मार्टीन लूथर किंग और उन तमाम लोगो कि जीत है जो सोचते है कि हाँ आज उन्होंने कुछ पाया है या फिर हाँ आज कुछ नया इस दुनिया में हुआ है ! चलिए वो तो आने वाला वक्त बतायेगा !
क्या ओबामा कि जीत वाकई में गाँधी , मार्टीन लूथर किंग और उन तमाम लोगो कि जीत है जो सोचते है कि हाँ आज उन्होंने कुछ पाया है या फिर हाँ आज कुछ नया इस दुनिया में हुआ है ! चलिए वो तो आने वाला वक्त बतायेगा !
Tuesday, January 13, 2009
बुश का भारत प्रेम !
एक न्यूज चैनल देश रहा था, जिसमे एक रिपोर्ट दिखाई जा रही थी रिपोर्ट थी बुश पर , जो अपना कार्यकाल समाप्त करने जा रहे है , और उसमे बुश एक प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे ! बुश का कहना था की अभी हाल के सालों में अमेरिका की साक जरूर ख़राब हुई है लेकिन आज भी लोग उन्हें पसंद करते है , अगर आप अफ्रीका जाए या आप भारत जाए तो वहाँ के लोगो से मेरे बारे में पूंछे आपको अच्छी बात सुनने को मिलेंगी !
दरअसल ये बात कहकर शायद अपने दिल को समझा रहे थे और जाते जाते कुछ गलतिया भी स्वीकारना चाह रहे थे ! 9/11 के बाद जिस तरह से पूरी दुनिया ने करवट ली तो इस दुनिया का भूगोल ही बदल गया ! भयावह आतंकवाद का भूत जो केवल भारत जैसे देश के लिए नासूर बना हुआ था वो अपनी बोतल से निकल कर पूरी दुनिया पर छाने लगा , फिर चाहे वो अमेरिका हो ,ब्रिटेन हो या मेड्रिड में हुए बम धमाके, सभी जगह ये देखा जाने लगा की जो भारत इतने सालों से चीख-चीख कर अपनी बात दुनिया को बता रहा था , वो सही थी !
दरअसल सच बात तो ये है की अमेरिका द्वारा छेड़ी गई लडाई का कोई हल नही निकला , बल्कि उसने अपने हजारों करोडो डॉलर और बहुत सारे सैनिको को जरूर गंवाया ! आज भी अफगानिस्तान और इराक में एक दिन भी ऐसा नही जाता है जिसमे रोज एक अमेरिकी ना मारा जाता हो , बल्कि अब तो अमेरिका चाहकर भी अपना हाथ इराक और अफगान से नही निकल पा रहा है !
अब अगर बुश ये कहना की भारतीय लोग उन्हें पसंद करते है तो क्या सच है ? , क्या भारत की जनता सचमुच बुश के बारे में अच्छा सोचती है ! मुझे तो नही लगता , बुश आंशिक रूप से ही भारत के लिए अच्छे हुए, वो भी बस न्यूक डील को लेकर , वरना बुश ने हम गरीब भारतीयों को दिया क्या है ? बेवजह आर्थिकमंदी के , युध्द के , महंगाई के ! आपको याद होगा पेट्रोल और डीजल के दाम इराक युध्द की वजह से ही असमान छूने लगे थे ! दो देशो पर युध्द करने वाला अमेरिका भारत को शान्ति का पाठ पढ़ाता है ! लेकिन उसका इसमें ख़ुद निजी स्वार्थ छिपा हुआ है अगर भारत, पाक पर जंग छेड़ता है तो पाक अपनी फौजों को अफगानिस्तान से हटा लेगा जो अमेरिका नही चाहता है !
जबकि बात रही न्यूक डील की तो उसमे वो एशिया में चीन से कड़ी टक्कर लेने के लिए भारत को आगे लाना है, क्योंकि अमेरिका जनता है की एशिया का ये ड्रेगन बहुत ऊँची उड़ान भर रहा है और इसकी गति केवल बाघ ही रोक सकता है ! इसीलिए अमेरिका और चीन के बीच में भारत कहीं बीच का बन्दर न बनकर रह जाए इसके लिए भारत सरकार को अपनी विदेश नीति के आवश्यक बदलाव करने होंगे , हाँ ये बात सहीं है कि अगर हमें 2025 तक कुछ बनना भी है तो 3 दुनिया के देशो जैसा व्यवहार करना बंद करे !
दरअसल ये बात कहकर शायद अपने दिल को समझा रहे थे और जाते जाते कुछ गलतिया भी स्वीकारना चाह रहे थे ! 9/11 के बाद जिस तरह से पूरी दुनिया ने करवट ली तो इस दुनिया का भूगोल ही बदल गया ! भयावह आतंकवाद का भूत जो केवल भारत जैसे देश के लिए नासूर बना हुआ था वो अपनी बोतल से निकल कर पूरी दुनिया पर छाने लगा , फिर चाहे वो अमेरिका हो ,ब्रिटेन हो या मेड्रिड में हुए बम धमाके, सभी जगह ये देखा जाने लगा की जो भारत इतने सालों से चीख-चीख कर अपनी बात दुनिया को बता रहा था , वो सही थी !
दरअसल सच बात तो ये है की अमेरिका द्वारा छेड़ी गई लडाई का कोई हल नही निकला , बल्कि उसने अपने हजारों करोडो डॉलर और बहुत सारे सैनिको को जरूर गंवाया ! आज भी अफगानिस्तान और इराक में एक दिन भी ऐसा नही जाता है जिसमे रोज एक अमेरिकी ना मारा जाता हो , बल्कि अब तो अमेरिका चाहकर भी अपना हाथ इराक और अफगान से नही निकल पा रहा है !
अब अगर बुश ये कहना की भारतीय लोग उन्हें पसंद करते है तो क्या सच है ? , क्या भारत की जनता सचमुच बुश के बारे में अच्छा सोचती है ! मुझे तो नही लगता , बुश आंशिक रूप से ही भारत के लिए अच्छे हुए, वो भी बस न्यूक डील को लेकर , वरना बुश ने हम गरीब भारतीयों को दिया क्या है ? बेवजह आर्थिकमंदी के , युध्द के , महंगाई के ! आपको याद होगा पेट्रोल और डीजल के दाम इराक युध्द की वजह से ही असमान छूने लगे थे ! दो देशो पर युध्द करने वाला अमेरिका भारत को शान्ति का पाठ पढ़ाता है ! लेकिन उसका इसमें ख़ुद निजी स्वार्थ छिपा हुआ है अगर भारत, पाक पर जंग छेड़ता है तो पाक अपनी फौजों को अफगानिस्तान से हटा लेगा जो अमेरिका नही चाहता है !
जबकि बात रही न्यूक डील की तो उसमे वो एशिया में चीन से कड़ी टक्कर लेने के लिए भारत को आगे लाना है, क्योंकि अमेरिका जनता है की एशिया का ये ड्रेगन बहुत ऊँची उड़ान भर रहा है और इसकी गति केवल बाघ ही रोक सकता है ! इसीलिए अमेरिका और चीन के बीच में भारत कहीं बीच का बन्दर न बनकर रह जाए इसके लिए भारत सरकार को अपनी विदेश नीति के आवश्यक बदलाव करने होंगे , हाँ ये बात सहीं है कि अगर हमें 2025 तक कुछ बनना भी है तो 3 दुनिया के देशो जैसा व्यवहार करना बंद करे !
Wednesday, December 10, 2008
ओबामा ओबामा ओबामा
ओबामा ओबामा , अरे बस करो यार अब , जब देखो हर किसी के मुहँ से यंही नाम सुनने को मिल रहा है ! जैसे ओबामा नही हुए कलयुग में विष्णु के अवतार ने जन्म ले लिया हो जैसे वो अब पूरी दुनिया में शान्ति लायेंगे , दुष्टों का संहार करेंगे और पूरी दुनिया को गरीबी (आर्थिक मंदी) से बचायेंगे ! कम से कम हमारे भारतीय तो उसे देवता का अवतार समझने लगे है ! अगर कोई विदेशी हनुमान की मूर्ती हमेशा अपने पास रखे और गाँधी जी तस्वीर अपने ऑफिस में रखे तो इस पर भारतीयों को उसमे विशेष रूचि होंगी मुझे तो लगता है की इतनी खुशी तो हमें अपने शहर के सांसद के चुनने पर भी नही होती है जितने उसके अमेरिका के राष्ट्रपति बनने पर हुई ये तो वो वाली बात हो गई, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना !
और वैसे भी आखिर इस ओबामा ने क्या कर दिया है जो सभी लोग इसके पीछे पगलाये हुए है अरे भाई अभी तक उसने बस हमारे नेताओ की तरह बोल वचन ही तो फेकें है जब उस पर अमल होगा तब की तब देखी जायेंगी ! ना जाने कितने ढेरो लेख पढ़े मैंने ओबामा को जानने के लिए लेकिन मुझे तो अभी तक कोई ऐसी बात उसमे नही दिखी सिवाय उनके प्रभावशाली भाषण के ! हमारे भारतीय लेखको ने अखबार रंग दिए, ओबामा के लिए खूब कसीदे पड़े जैसे " भारतीयों को भी एक ओबामा की तलाश " या "भारतीय ओबामा की तलाश " !
और वैसे अब मुझे इन अमेरिकियों से चिड होने लगी है, कि इनको इनका ओबामा मिल गया, साला हमें कब अपना ओबामा मिलेंगा ! पहले बात तो मित्रों ये की अगर हमें अगर भारतीय ओबामा चाहिए तो सबसे पहले ये जितने भी प्राचीन काल के बुढ्डे ठुड्डे ओबामा है इनसे मुक्ति पानी होगी क्यूंकि ये 75 और 80 साल की उम्र हरिमाला जपने की होती है राजनीती की नही, और फिर यह ऊपर जाकर भगवान् को क्या जवाब देंगे की क्यों हमने हरी का नाम एक बार भी नही लिया क्यूँकी हम राजनीती में थे ! इनको हटाने की एक वजह और भी है वो यह की यह देश अब युवायो का है इसीलिए नेता भी अब युवा चाहिए, वो नही जिसके साइन करते टाइम हाथ कपकपाते हो ...इसीलिए युवा नेता हमारे देश की युवायो के विचारों को अच्छी तरह से जानने वाला होगा क्योंकि वो हमारी सदी में पैदा हुआ है इसीलिए आज के हालत से अच्छी तरह वाकिफ है आज की भाषा आज के नियम सब कुछ चेंज हो चुका है तो आज का नेता इससे ज्यादा अच्छी तरह से पहचान सकता है और समाज की क्या डिमांड है उसे महसूस कर सकता है ! वो देश के लिए तार्किक मुद्दे ला सकता हैं जो बस देश के अच्छे भविष्य के लिए हो ना की किसी पार्टी विशेष को नीचा दिखने के लिए (हमारे नेता मुद्दों से दूसरी पार्टियों को घेरते है ) ! और वो भाषण भी ऐसा दे जिससे समाज के अन्दर करंट दौड़ जाए, वैसे नही जैसे हमारे नेता भी देते है जो सन 1947 से बातें शुरू करते है और 1975 के आपातकाल के किस्से सुनाते है तथा पुरानी सरकार से अपनी सरकार की तुलना करते रहते है ! बल्कि अब तो हमें अपने देश की, किसी अच्छे और विकसित देश से तुलना करे !
काश ऐसा नेता मिल जाए रे ," पता नही कैसा दिखता होगा वो कहाँ होगा वो " वैसे तो ऐसे शब्द किसी शादी लायक लड़की के सपने जैसे होते है , पर आज ये पूरे भारत के शब्द है कि किधर है वो ! आज की राजनीती को देखकर निकाह फ़िल्म में सलमा आगा का गीत की लाइन याद आ गई की " शायद उनका आखिरी हो ये सितम, हर सितम ये सोच कर सहते रहे "
अब आजा कहाँ छुपा है तू मेरे ओबामा
और वैसे भी आखिर इस ओबामा ने क्या कर दिया है जो सभी लोग इसके पीछे पगलाये हुए है अरे भाई अभी तक उसने बस हमारे नेताओ की तरह बोल वचन ही तो फेकें है जब उस पर अमल होगा तब की तब देखी जायेंगी ! ना जाने कितने ढेरो लेख पढ़े मैंने ओबामा को जानने के लिए लेकिन मुझे तो अभी तक कोई ऐसी बात उसमे नही दिखी सिवाय उनके प्रभावशाली भाषण के ! हमारे भारतीय लेखको ने अखबार रंग दिए, ओबामा के लिए खूब कसीदे पड़े जैसे " भारतीयों को भी एक ओबामा की तलाश " या "भारतीय ओबामा की तलाश " !
और वैसे अब मुझे इन अमेरिकियों से चिड होने लगी है, कि इनको इनका ओबामा मिल गया, साला हमें कब अपना ओबामा मिलेंगा ! पहले बात तो मित्रों ये की अगर हमें अगर भारतीय ओबामा चाहिए तो सबसे पहले ये जितने भी प्राचीन काल के बुढ्डे ठुड्डे ओबामा है इनसे मुक्ति पानी होगी क्यूंकि ये 75 और 80 साल की उम्र हरिमाला जपने की होती है राजनीती की नही, और फिर यह ऊपर जाकर भगवान् को क्या जवाब देंगे की क्यों हमने हरी का नाम एक बार भी नही लिया क्यूँकी हम राजनीती में थे ! इनको हटाने की एक वजह और भी है वो यह की यह देश अब युवायो का है इसीलिए नेता भी अब युवा चाहिए, वो नही जिसके साइन करते टाइम हाथ कपकपाते हो ...इसीलिए युवा नेता हमारे देश की युवायो के विचारों को अच्छी तरह से जानने वाला होगा क्योंकि वो हमारी सदी में पैदा हुआ है इसीलिए आज के हालत से अच्छी तरह वाकिफ है आज की भाषा आज के नियम सब कुछ चेंज हो चुका है तो आज का नेता इससे ज्यादा अच्छी तरह से पहचान सकता है और समाज की क्या डिमांड है उसे महसूस कर सकता है ! वो देश के लिए तार्किक मुद्दे ला सकता हैं जो बस देश के अच्छे भविष्य के लिए हो ना की किसी पार्टी विशेष को नीचा दिखने के लिए (हमारे नेता मुद्दों से दूसरी पार्टियों को घेरते है ) ! और वो भाषण भी ऐसा दे जिससे समाज के अन्दर करंट दौड़ जाए, वैसे नही जैसे हमारे नेता भी देते है जो सन 1947 से बातें शुरू करते है और 1975 के आपातकाल के किस्से सुनाते है तथा पुरानी सरकार से अपनी सरकार की तुलना करते रहते है ! बल्कि अब तो हमें अपने देश की, किसी अच्छे और विकसित देश से तुलना करे !
काश ऐसा नेता मिल जाए रे ," पता नही कैसा दिखता होगा वो कहाँ होगा वो " वैसे तो ऐसे शब्द किसी शादी लायक लड़की के सपने जैसे होते है , पर आज ये पूरे भारत के शब्द है कि किधर है वो ! आज की राजनीती को देखकर निकाह फ़िल्म में सलमा आगा का गीत की लाइन याद आ गई की " शायद उनका आखिरी हो ये सितम, हर सितम ये सोच कर सहते रहे "
अब आजा कहाँ छुपा है तू मेरे ओबामा
Wednesday, December 3, 2008
दो निशानेबाजों की कहानी !
इस लेख की प्रेरणा मुझे मेंरे मित्र से चर्चा की दौरान मिली जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि निशानेबाजों में भी फर्क होता है !
दरअसल दो निशानेबाज जिनमे से एक ने अपने देश का नाम ऊँचा किया तो दूसरे ने अपने माँ बाप का नाम ऊँचा किया ! फिर भी दोनों के काम में बहुत बड़ा अन्तर था !
पहला निशानेबाज जिसने ओलिम्पिक्स में भारत के लिए पहला व्यक्तिगत गोल्ड मैडल जीता , और पूरे देश को गौरवान्वित होने का मौका दिया और पूरे देश ने उसे पलकों में बिछा लिया , हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने उस निशानेबाज को फ़ोन कर बधाई दी बल्कि उनसे और उसके परिवार से भी मिले बाकायदा सभी का वीआईपी जैसा स्वागत हुआ , और तो और सारे राज्य उसपर वारें जा रहे थे कोई देता उसे 5 लाख तो कोई 10 लाख कुल मिलकर पुरस्कारों की कीमत पहुँची ३ करोड़ तक साथ ही विज्ञापन मिले अलग से !
हमारा दूसरा निशानेबाज एक कमांडो है उसने भी देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया वो भी अपने देश लिए जान पर खेलकर लाया आजादी ! एक ऐसी आजादी जिसमे भारत के लोगो को दिया हौंसला और दी एक ऐसी आशा जिसमे किसी के सपने ना मर सके ! उसे भी पुरस्कार मिला वो भी 5 लाख का ! उसके पास किसी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का फ़ोन नही आया और ना ही उसके परिवार से कोई मिला और जो मिलने भी गया उससे भी उसे मिली गाली !
क्या इस देश में स्वर्ण पदक की कीमत 3 करोड़ है जबकि जान की कीमत के लगते है सिर्फ़ 5 लाख ? क्या इस देश में स्वर्णपदक अब देशभक्ति से ज्यादा मायने रखने लगा है ? क्या यह ये वहीं देश है जिसमे भगत सिंह ने अपनी जान सिर्फ़ इसलिए दी की उनसे प्रेरणा लेकर हजारों भगत सिंह पैदा हो सके और अपने देश पर मर मिटें !
पर क्या अब कोई माँ-बाप अपने बच्चे को आर्मी या देश के लिए मर मिटने को कहेगा ? जिस देश में देशभक्तों का ऐसा सम्मान होता है , जिस देश में सरकार बचाने के लिए सभी दलों के लिए रात्रि भोज का आयोजन किया जाता है परन्तु जवानों के लिए ढंग के बुलेटप्रूफ जैकेट नही मिलते ! जवानों के ताबूतों पर घूस खाई जाती है ! नही शायद अब नही कोई कहेंगा की बेटा जाओ और देश की रक्षा करो !
पर जाते जाते एक बात की अभिनव और संदीप, इन दोनों की निशानेबाजी में एक बहुत बड़ा अन्तर ये था कि संदीप जिस चीज को निशाना लगा रहे थे उन्हें पलटकर गोलिया का जवाब भी मिल रहा था परन्तु अभिनव के साथ ऐसा कुछ नही था !
दरअसल दो निशानेबाज जिनमे से एक ने अपने देश का नाम ऊँचा किया तो दूसरे ने अपने माँ बाप का नाम ऊँचा किया ! फिर भी दोनों के काम में बहुत बड़ा अन्तर था !
पहला निशानेबाज जिसने ओलिम्पिक्स में भारत के लिए पहला व्यक्तिगत गोल्ड मैडल जीता , और पूरे देश को गौरवान्वित होने का मौका दिया और पूरे देश ने उसे पलकों में बिछा लिया , हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने उस निशानेबाज को फ़ोन कर बधाई दी बल्कि उनसे और उसके परिवार से भी मिले बाकायदा सभी का वीआईपी जैसा स्वागत हुआ , और तो और सारे राज्य उसपर वारें जा रहे थे कोई देता उसे 5 लाख तो कोई 10 लाख कुल मिलकर पुरस्कारों की कीमत पहुँची ३ करोड़ तक साथ ही विज्ञापन मिले अलग से !
हमारा दूसरा निशानेबाज एक कमांडो है उसने भी देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया वो भी अपने देश लिए जान पर खेलकर लाया आजादी ! एक ऐसी आजादी जिसमे भारत के लोगो को दिया हौंसला और दी एक ऐसी आशा जिसमे किसी के सपने ना मर सके ! उसे भी पुरस्कार मिला वो भी 5 लाख का ! उसके पास किसी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का फ़ोन नही आया और ना ही उसके परिवार से कोई मिला और जो मिलने भी गया उससे भी उसे मिली गाली !
क्या इस देश में स्वर्ण पदक की कीमत 3 करोड़ है जबकि जान की कीमत के लगते है सिर्फ़ 5 लाख ? क्या इस देश में स्वर्णपदक अब देशभक्ति से ज्यादा मायने रखने लगा है ? क्या यह ये वहीं देश है जिसमे भगत सिंह ने अपनी जान सिर्फ़ इसलिए दी की उनसे प्रेरणा लेकर हजारों भगत सिंह पैदा हो सके और अपने देश पर मर मिटें !
पर क्या अब कोई माँ-बाप अपने बच्चे को आर्मी या देश के लिए मर मिटने को कहेगा ? जिस देश में देशभक्तों का ऐसा सम्मान होता है , जिस देश में सरकार बचाने के लिए सभी दलों के लिए रात्रि भोज का आयोजन किया जाता है परन्तु जवानों के लिए ढंग के बुलेटप्रूफ जैकेट नही मिलते ! जवानों के ताबूतों पर घूस खाई जाती है ! नही शायद अब नही कोई कहेंगा की बेटा जाओ और देश की रक्षा करो !
पर जाते जाते एक बात की अभिनव और संदीप, इन दोनों की निशानेबाजी में एक बहुत बड़ा अन्तर ये था कि संदीप जिस चीज को निशाना लगा रहे थे उन्हें पलटकर गोलिया का जवाब भी मिल रहा था परन्तु अभिनव के साथ ऐसा कुछ नही था !
Tuesday, December 2, 2008
प्रसून जोशी की बेहतरीन कविता इस बार नहीं !
इस बार नहीं
इस बार जब वह छोटी सी बच्ची
मेरे पास अपनी खरोंच लेकर आएगी
मैं उसे फू-फू करके नहीं बहलाऊंगा
पनपने दूंगा उसकी टीस को
इस बार नहीं
इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखूंगा
नहीं गाऊंगा गीत पीड़ा भुला देने वाले
दर्द को रिसने दूंगा
उतरने दूंगा गहरे
इस बार नहीं
इस बार मैं ना मरहम लगाऊंगा
ना ही उठाऊंगा रुई के फाहे
और ना ही कहूंगा कि तुम आंखे बंद करलो,
गर्दन उधर कर लो मैं दवा लगाता हूं
देखने दूंगा सबको
हम सबको
खुले नंगे घाव
इस बार नहीं
इस बार जब उलझनें देखूंगा,
छटपटाहट देखूंगा
नहीं दौड़ूंगा उलझी डोर लपेटने
उलझने दूंगा जब तक उलझ सके
इस बार नहीं
इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊंगा औज़ार
नहीं करूंगा फिर से एक नई शुरुआत
नहीं बनूंगा मिसाल एक कर्मयोगी की
नहीं आने दूंगा ज़िंदगी को आसानी से पटरी पर
उतरने दूंगा उसे कीचड़ में, टेढ़े-मेढ़े रास्तों पे
नहीं सूखने दूंगा दीवारों पर लगा खून
हल्का नहीं पड़ने दूंगा उसका रंग
इस बार नहीं बनने दूंगा उसे इतना लाचार
की पान की पीक और खून का फ़र्क ही ख़त्म हो जाए
इस बार नहीं
इस बार घावों को देखना है
गौर से
थोड़ा लंबे वक्त तक
कुछ फ़ैसले
और उसके बाद हौसले
कहीं तो शुरुआत करनी ही होगी
इस बार यही तय किया है
-- :प्रसून जोशी
इस बार जब वह छोटी सी बच्ची
मेरे पास अपनी खरोंच लेकर आएगी
मैं उसे फू-फू करके नहीं बहलाऊंगा
पनपने दूंगा उसकी टीस को
इस बार नहीं
इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखूंगा
नहीं गाऊंगा गीत पीड़ा भुला देने वाले
दर्द को रिसने दूंगा
उतरने दूंगा गहरे
इस बार नहीं
इस बार मैं ना मरहम लगाऊंगा
ना ही उठाऊंगा रुई के फाहे
और ना ही कहूंगा कि तुम आंखे बंद करलो,
गर्दन उधर कर लो मैं दवा लगाता हूं
देखने दूंगा सबको
हम सबको
खुले नंगे घाव
इस बार नहीं
इस बार जब उलझनें देखूंगा,
छटपटाहट देखूंगा
नहीं दौड़ूंगा उलझी डोर लपेटने
उलझने दूंगा जब तक उलझ सके
इस बार नहीं
इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊंगा औज़ार
नहीं करूंगा फिर से एक नई शुरुआत
नहीं बनूंगा मिसाल एक कर्मयोगी की
नहीं आने दूंगा ज़िंदगी को आसानी से पटरी पर
उतरने दूंगा उसे कीचड़ में, टेढ़े-मेढ़े रास्तों पे
नहीं सूखने दूंगा दीवारों पर लगा खून
हल्का नहीं पड़ने दूंगा उसका रंग
इस बार नहीं बनने दूंगा उसे इतना लाचार
की पान की पीक और खून का फ़र्क ही ख़त्म हो जाए
इस बार नहीं
इस बार घावों को देखना है
गौर से
थोड़ा लंबे वक्त तक
कुछ फ़ैसले
और उसके बाद हौसले
कहीं तो शुरुआत करनी ही होगी
इस बार यही तय किया है
-- :प्रसून जोशी
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